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Saturday, February 13, 2010

क्या इसे ही मानव कहते (Kya ise hi maanav kahte)

मैंने जग को रोते देखा,
फूलों को मुरझाते देखा,
कभी दिन, कभी रात को देखा,
बहुत कष्ट है इस दुनिया में,
जब जब मैंने इनको देखा,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही जीवन कहते,
क्या यही जीवन का सार|

एक भिखारी जा रहा है,
रखे पेट पर हाथ दो अपने,
सूखे होंठ, पिचके गाल,
ले अन्दर को धंसा हुआ पेट,
इस आशा में दाता से,
कि क्या आज में उनसे पाऊं|
जब से मैंने उसको देखा, गूंजा........

मजदूर कि गोद में लेटा बच्चा,
दूध दूध चिल्लाता हैं,
रो-रो कर हुआ बुरा हाल,
फिर भी कुछ ना पता हैं,
उधर बंगले पर मैडम का कुत्ता,
नखरे कर-कर खाता है|
इंसानों का ऐसा नंगा नाच,
जब-जब मैंने देखा, गूंजा............

हुए अनाथ मां-बाप आज,
अपनी संतानों के हाथों,
जीवन सारा था बीता दिया,
जिनको समर्थ बनाने में|
वे धूल आज फांक रहे,
अनाथाश्रम के द्वारों में,
इन आँखों के रोते देखा, गूंजा.............

जिन्दगी बदतर है मानव की,
आज पशु से भी बढ़कर,
कुछ लोग तो खाना चख कर छोड़े,
कुछ पिचके पेट लिए फिरते,
कुछ हुए बेगाने आज यहाँ,
अपनों के ही हाथों से,
व्यथा के आंसू देख सभी के,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही मानव कहते,
क्या यही है इश्वर का अनुपम अविष्कार.....................