मैंने जग को रोते देखा,
फूलों को मुरझाते देखा,
कभी दिन, कभी रात को देखा,
बहुत कष्ट है इस दुनिया में,
जब जब मैंने इनको देखा,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही जीवन कहते,
क्या यही जीवन का सार|
एक भिखारी जा रहा है,
रखे पेट पर हाथ दो अपने,
सूखे होंठ, पिचके गाल,
ले अन्दर को धंसा हुआ पेट,
इस आशा में दाता से,
कि क्या आज में उनसे पाऊं|
जब से मैंने उसको देखा, गूंजा........
मजदूर कि गोद में लेटा बच्चा,
दूध दूध चिल्लाता हैं,
रो-रो कर हुआ बुरा हाल,
फिर भी कुछ ना पता हैं,
उधर बंगले पर मैडम का कुत्ता,
नखरे कर-कर खाता है|
इंसानों का ऐसा नंगा नाच,
जब-जब मैंने देखा, गूंजा............
हुए अनाथ मां-बाप आज,
अपनी संतानों के हाथों,
जीवन सारा था बीता दिया,
जिनको समर्थ बनाने में|
वे धूल आज फांक रहे,
अनाथाश्रम के द्वारों में,
इन आँखों के रोते देखा, गूंजा.............
जिन्दगी बदतर है मानव की,
आज पशु से भी बढ़कर,
कुछ लोग तो खाना चख कर छोड़े,
कुछ पिचके पेट लिए फिरते,
कुछ हुए बेगाने आज यहाँ,
अपनों के ही हाथों से,
व्यथा के आंसू देख सभी के,
गूंजा एक विचार,
क्या इसे ही मानव कहते,
क्या यही है इश्वर का अनुपम अविष्कार.....................
दर्द से रिश्ता है मेरा, गम के घूंट पिया करता हूँ, बांटता हूँ खुशीयाँ सबको, गम का सौदा किया करता हूँ|
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Saturday, February 13, 2010
मुझे आने दो (Mujhe aane do)
नारी को समर्पित ये कविता....
नारी अबला नहीं है, यह उस पर निर्भर है की वो प्राणदायी बनाना चाहती है या प्राणहर्ता.... दुनिया को वो एक और सृजनकर्ता देना चाहती है या फिर बनना चाहती है एक संहारक.......
आने दो, मुझे आने दो,
बस एक बार मुझे आने दो|
ये आवाज़ कहाँ से आई है,
कुछ इधर देख,
कुछ उधर देख,
ये कौन मुझे पुकार रहा.......
आने दो मां, आने दो,
बेटी का धर्म निभाने दो,
बस एक बार मां मुझे,
इस दुनिया में आने दो|
क्यूँ दबा रही हो हस्ती को,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
मुझेको आने दो|
मां तुम भी तो एक बेटी हो,
मुझको भी ये हक पाने दो,
तुम रूप सरस्वती, दुर्गा का,
बस अंश रूप पा जाने दो,
मैं ज्योति बन कर उभरी हूँ,
मुझको ज्वाला बन जाने दो|
हरदम सहा है सौतेला व्यवहार,
नहीं मिला तुम्हे बेटे सा प्यार,
बस हरदम रही तेरी पुकार,
बेटी हूँ मैं माँ तेरी,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
आने दो, मुझे आने दो,
इस कोख से मां तेरी,
मुझको बहार आ जाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
मां,
बेटी होती सहनशील,
बेटी होती जीवन आधार,
हर गम यु ही सह जाती है,
करती है न जाने कितने त्याग,
बेटी बनकर बांटे खुशियाँ,
मां बनकर बांटे असीम प्यार,
मुझको भी इस सागर में,
प्यार के गोते लगाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
वात्सल्य तुम्ही मां, प्यार तुम्ही,
फटकार तुम्ही मां, पुचकार तुम्ही,
बच्चों के लिए वरदान तुम्ही,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
ना देना खुद को दोष कभी,
ना रोना मुझको खो कर कभी,
ना दुनिया मेरे लायक बची,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
मुझको अन्दर मर जाने दो|
नारी अबला नहीं है, यह उस पर निर्भर है की वो प्राणदायी बनाना चाहती है या प्राणहर्ता.... दुनिया को वो एक और सृजनकर्ता देना चाहती है या फिर बनना चाहती है एक संहारक.......
आने दो, मुझे आने दो,
बस एक बार मुझे आने दो|
ये आवाज़ कहाँ से आई है,
कुछ इधर देख,
कुछ उधर देख,
ये कौन मुझे पुकार रहा.......
आने दो मां, आने दो,
बेटी का धर्म निभाने दो,
बस एक बार मां मुझे,
इस दुनिया में आने दो|
क्यूँ दबा रही हो हस्ती को,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
मुझेको आने दो|
मां तुम भी तो एक बेटी हो,
मुझको भी ये हक पाने दो,
तुम रूप सरस्वती, दुर्गा का,
बस अंश रूप पा जाने दो,
मैं ज्योति बन कर उभरी हूँ,
मुझको ज्वाला बन जाने दो|
हरदम सहा है सौतेला व्यवहार,
नहीं मिला तुम्हे बेटे सा प्यार,
बस हरदम रही तेरी पुकार,
बेटी हूँ मैं माँ तेरी,
मुझको आवाज़ उठाने दो,
आने दो, मुझे आने दो,
इस कोख से मां तेरी,
मुझको बहार आ जाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
मां,
बेटी होती सहनशील,
बेटी होती जीवन आधार,
हर गम यु ही सह जाती है,
करती है न जाने कितने त्याग,
बेटी बनकर बांटे खुशियाँ,
मां बनकर बांटे असीम प्यार,
मुझको भी इस सागर में,
प्यार के गोते लगाने दो,
आने दो, मुझे आने दो|
वात्सल्य तुम्ही मां, प्यार तुम्ही,
फटकार तुम्ही मां, पुचकार तुम्ही,
बच्चों के लिए वरदान तुम्ही,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
ना देना खुद को दोष कभी,
ना रोना मुझको खो कर कभी,
ना दुनिया मेरे लायक बची,
गर लगता तुम्हे गलत जरा,
मेरा दुनिया में आ जाना,
ना आने दो, ना आने दो,
मुझको अन्दर मर जाने दो|
मुझको अन्दर मर जाने दो|
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